रुद्रपुर: भू कानून और स्थायी निवास को लेकर कोई बदलाव स्वीकार नहीं: बेहड़

रुद्रपुर। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री एवं किच्छा के विधायक तिलकराज बेहड़ ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि भू कानून और स्थायी निवास/मूल निवास को लेकर सरकार और आंदोलनकारियों को स्थिति साफ करनी होगी। एक भाजपा विधायक के उस बयान पर कि उनका शरीर भाजपा के साथ है और आत्मा आंदोलनकारियों के साथ है पर बेहड़ ने मुख्यमंत्री से जबाव मांगा, साथ ही तराई के भाजपा विधायकों से कहा कि वे स्पष्ट करें कि उनकी आत्मा किसके साथ है।

विधायक बेहड़ अपने आवास पर पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राज्य आंदोलन में सभी की हिस्सेदारी रही है। छोटे राज्य की स्थापना विकास की सोच के चलते की गई थी। उस वक्त उत्तर प्रदेश का भू कानून लागू किया गया था। साथ ही 15 साल तक यहां रहने वालों को स्थायी निवास प्रमाणपत्र देने का शासनादेश जारी हुआ था। अब इसमें कोई बदलाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।

कहा कि आंदोलन करना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ होना चाहिए। ब्यूरोक्रेसी उत्तराखंड को लूट रही है। आंदोलन इस बात को लेकर होना चाहिए कि उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा को तहस नहस किया जा रहा है और अंधाधुंध खनन हो रहा है। दूसरे राज्य के लोगों को खनन का ठेका दिया जा रहा है। कहा कि भू कानून को लेकर किए जा रहे आंदोलन के पीछे की मंशा स्पष्ट होनी चाहिए।

आज बाजपुर के बीस गांवों की जमीन का मुद्दा है, जिसे सरकार हल नहीं कर रही है। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब भाजपा की त्रिवेन्द्र रावत सरकार थी तो ऊधमसिंह नगर के तत्कालीन डीएम डी सेंथिल पांडियन ने प्राग फार्म की जमीन राज्य सरकार के नाम दर्ज कर दी थी, लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में तीसरे दिन ही डीएम हटा दिए गए और राज्य सरकार के नाम की गई जमीन को पुन: प्राग फार्म के नाम कर दिया गया। लालकृष्ण आडवाणी के करीबी दिल्ली के गुप्ता परिवार को चार सौ एकड़ जमीन दी गई और कब्जा दिलाने के लिए पूर्व सांसद बलराज पासी और विधायक अरविंद पांडेय पूरे साजो-सामान के साथ गए थे। कहा कि जब उस वक्त डीएम का आदेश पलटा गया तो अब बाजपुर के बीस गांवों को लेकर डीएम का आदेश क्यों नहीं पलटा जा सकता है। मुख्यमंत्री सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं, जबकि चाहें तो कैबिनेट की बैठक बुलाकर बाजपुर की समस्या का समाधान कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि किच्छा चीनी के मेंटेनेंस के लिए 12 करोड़ रुपए खर्च किए गए, लेकिन चीनी मिल रोज बंद हो रही है। जब मिल कम चलेगी तो घाटे में जाएगी। ऐसे में सरकार को मिल को प्राइवेट सेक्टर में देने का मौका मिल जाएगा। दरअसल सरकार की मंशा ही चीनी मिल को प्राइवेट सेक्टर में देने की है। अन्यथा यह जांच होनी चाहिए कि करोड़ों रुपया कहां लगा। यदि मरम्मत हुई तो मिल बंद क्यों हो रही है।

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