हर सरकार में उजड़ते रहे हैं लोग, और विपक्ष इसी तरह छाती पीटता है – जेबी सिंह की कलम से

आज जो राजनैतिक दल छाती पीट-पीटकर कह रहे हैं हाय हम न रहे!हाय हम न रहे! वे भी पहले सरकार में थे तब भी यह सब होता रहता था। आज जो सरकार में हैं वे अगर विपक्ष में होते तो वे भी छाती पीट रहे होते और कहते हमारे जीते जी अतिक्रमण नही हट सकता। किच्छा और एस्कार्ट्स फार्म में ये ही लोग जीने मरने की कसमें खा रहे थे जैसे आज का विपक्ष!

आप लोग हल्द्वानी के रेलवे भूमि पर अतिक्रमण हटाने के विरुद्ध पूरे देश और दुनिया में हुए विरोध को नही भूले होंगे ऐसा विरोध रुद्रपुर में क्यों नही हुआ! क्योंकि वहाँ प्रभावित होने वाले अधिकांश अल्पसंख्यक थे। मैं सरकारी कार्य में बाधा का पक्षधर नही हूँ पर राजनैतिक दलों के दोहरे चरित्र को उजागर करना भी जरूरी है।

सरकार के लोगों का हाल आपने पढा ,सरकारी लोगों और राजनेताओं को तुलनात्मक समझने के लिए,यहाँ मैं एक मंत्री जी का और एक आइएएस अधिकारी का वार्तालाप साझा कर रहा हूँ। एक मंत्री जी बता रहे थे कि क्षेत्र के कुछ प्रभावशाली लोग आए और एक ऐसे काम के लिए सिफारिश का दबाव बनाने लगे जो सम्भव ही नही था। मंत्री जी ने उनसे कहा भाई जो काम नियमतः हों, उन्हीं को लेकर आया करो ,महाशय बोले साहब जो नियमतः होने वाले काम हैं वे तो स्वतः हो जाते हैं। जो नहीं होने वाले हैं उन्हें ही तो आपके पास लाते हैं! इसे और स्पष्ट करने के एक अधिकारी की बात पढ़िए । उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही, इससे आप लोगों को राजनेताओं की स्थिति स्पष्ट होगी। वे कहते हैं,कहने को हम सिविल सर्वेन्ट हैं पर जनता हमारे यहाँ अनुरोध लेकर आती है और नेता के यहाँ अधिकार से जाती है। हम यदि कहते हैं अभी नहीं मिल सकते या यह काम नहीं हो सकता वह चुपचाप चले जाएंगे पर नेता से उलझ जाएंगे उसे अगले चुनाव में देख लेने की धमकी भी दे सकते हैं। इसलिए नेता की अपेक्षा सरकारी नुमाइंदों को काम करना अधिक आसान है ,उन्हें बस अपने मन से स्थानान्तरण का भय निकालना होता है। इससे हमें सहज अनुमान लगता है कि राजनेता की अपेक्षा सरकारी नुमाइंदे अधिक उत्तरदायी हैं।

रोजी रोजगार की तलाश में जब लोग सड़क के किनारे या सरकारी जमीन पर ठेला फड़ या खोखा लगाते हैं तो जिम्मेदार एजेंसियां हटाने का प्रयास करती हैं। नेता लोग उन्हें सही मार्ग न दिखा कर उसमें अड़ंगा डालते हैं , नेताओं की आड़ में सरकारी लोग भी कुछ ले देके चुप हो जाते हैं। कुछ नेता तो अपने क्षेत्र अपनी जाति और अपने धर्म के लोगों को वोट बैंक के लालच में अवैध तरीके से शहरों में बसवाते हैं। आम नागरिक भी चुपचाप देखता रहता है उसे व्यापार उद्योग और घरों में काम करने के लिए श्रमिक मिल जाते हैं। जो सबसे खतरनाक है वह अवैध बस्तियों और नजूल भूमि आदि को शुल्क या निशुल्क रूप से वैध करने की अस्पष्ट नीतियां, जिससे हर व्यक्ति को उम्मीद बंध जाती है आज नहीं तो कल हमारी दुकान या बस्ती फ्री होल्ड हो जाएगी। इसमें से कुछ की उम्मीदें तो पूर्ण हो जाती हैं, कुछ की उम्मीदों को जेसीबी से ध्वस्त कर दिया जाता है। यदि इस सब की स्पष्ट, दूरगामी और निष्पक्ष नीति बने तो इस त्रासदी से बहुत कुछ बचाव हो सकता है।
रोजी रोजगार की तलाश, जिम्मेदार एजेंसियों की घूसखोरी, लापरवाही और सत्तारूढ राजनैतिक दलों की अवैध को वैध करने की नीति और विपक्ष में रहने पर खोखला विरोध इन सब के लिए जिम्मेदार है।
अब आगे इसके समाधान पर •••••क्रमशः

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