क्यों होता है अतिक्रमण, इसे समझना जरूरी, समाजसेवी जेबी सिंह की कलम से

जेबी सिंह (समाजसेवी)
रुद्रपुर के लोहिया बाजार के धवस्तीकरण की धूल अब धीरे धीरे शान्त हो रही है। सरकारी अमला अपनी जिम्मेवारी कम खानापूरी अधिक कर अपने नौकरी में लग गया, राजनेता इसके नफा नुकसान की गणित लगा रहे हैं आमजन में मिश्रित प्रतिक्रिया हो रही है कोई ठीक बता रहा है कोई गलत। पर जिनकी दुकाने, फड़ और ठेले उजड़े हैं उनके घर मातम छाया है।
अतिक्रमण टूटने से पहले अतिक्रमण क्यों होता है इसे समझना होगा। एक तो गुण्डे भूमाफिया या सत्ता संपन्न लोग सरकारी भूमियों पर कब्जा कर उसे कानूनी दावपेंच से हथिया भी लेते हैं। दूसरे लोग गाँव देहात और कस्बाई क्षेत्र से आते हैं जहाँ रोजगार के अवसर न के बराबर हैं। सरकारी और निजी क्षेत्र भारत की विस्फोटक आबादी को रंच मात्र नौकरी दे सकता है। अब लोग करें तो करें क्या!चोरी ,डकैती, ठगी की जगह वे स्वरोजगार के लिए शहरों की तरफ पलायन करते हैं। उनके पास कोई पूंजी तो होती नहीं इसलिए वे सड़क पर ठेला और फड़ लगाकर फल ,सब्जी ,चाट पकौड़ी और चाय का छोटा-मोटा कारोबार शुरू कर देते हैं। फिर रहने के लिए सड़क, नाले , रेलवे या नजूल की भूमि पर झुग्गी झोपड़ी बना लेते हैं। इनमें से कुछ लोग अपने परिश्रम और कौशल से अच्छा व्यवसाय करने लगते हैं और सरकारी नुमाइंदों को पैसा देकर स्थाई दुकाने बना लेते हैं। उन्हें बिजली के कनेक्शन मिल जाते हैं निगम उनसे तहबाजारी वसूलने लगती है। धीरे धीरे इनकी संख्या बढ़ती जाती है। वोट बैंक के लालच में नेता भी उन्हें झूठे आश्वासनों से गुमराह करते रहते हैं। मतलब सरकारी घूस और नेताओं के वादों से यह सब स्थाई हो जाता है। फिर जब वर्षों बाद न्यायालय या किसी अन्य कारण से यह सब टूटता है तो सैकड़ों हजारों परिवारों के सम्मुख रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाता है।
आज बस इतना ही आगे यदि आप लोगों की रुचि दिखी तो बिन्दुवार विस्तार से इसके कारणऔर निवारण पर लिखूँगा।
क्रमश:

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