गाँव को केंद्र में रख कर बनाई जाएं विकास योजनाएं तो रुकेगा पलायन और अतिक्रमण

जेबी सिंह की कलम से
अतिक्रमण कारण और निवारण पर व्यस्तता के कारण कई दिन लिख नही सका कुछ लोगों का आग्रह था इसे पूरा लिखें आज पंतनगर से अहमदाबाद की सुविधाजनक सीधी उड़ान में अवसर मिल गया, यात्रा के दौरान लिखना आसान तो होता ही है साथ ही सफर भी आसानी से कट जाता है। मैंने सत्ता सम्पन्न लोगों के अतिक्रमण की जगह ठेले फड़ और खोमचे वालों पर अपना लेख केन्द्रित किया था जो रोजी रोटी की तलाश में शहरों में आते हैं नौकरी न मिल पाने के कारण फल, सब्जी, चाय, चाट पकौड़ी, साईकल स्कूटर मैकेनिक, टायर में हवा भरने वाले आदि का छोटा मोटा व्यवसाय सड़क के किनारे शुरू कर देते हैं। पूर्व में इस पर विस्तार से चर्चा कर चुका हूँ।
जब तक गाँवों को केन्द्र में रखकर सरकार विकास की योजना नही बनाती तबतक पलायन और अतिक्रमण चलता रहेगा।
गाँव से लोग शहरों में जाकर अपना, अपने मां बाप और बाल बच्चों के लिए दो जून की रोटी, शिक्षा और स्वास्थ्य की मूलभूत सुविधा के लिए आते हैं । गाँव की स्वच्छ हवा ,जल, अन्न, खुले हवादार घर, परिवार संगी साथी सब को विवशता में त्यग कर शहरों में नदी नालों और सड़क किनारे खुले आसमान ,झुग्गी झोपड़ी, खोली, चाल में पशुओं से बदतर हालात में रहने को मजबूर होते है। जहां हवा पानी अन्न सबके लिए संघर्ष करना होता है। फिर शुरू होता है मजदूरी ढूढने का संघर्ष भूखे रहने का दौर ।इसी में से कुछ परिश्रमी और दूरदर्शी लोग सड़क किनारे अपना स्वरोजगार शुरू कर देते हैं कुछ का कारोबार चल निकलता है कुछ चल निकलते हैं।
इतना सब होने पर भी हम अतिक्रमण को किसी भी कीमत पर जायज नही ठहरा सकते। उत्तरदायी संस्थाओं को अतिक्रमण को प्रारम्भ में ही रोकना चाहिए। अवैध बस्तियों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को वैध नही करना चाहिए यदि सरकार उसे वैध करना चाहती है तो वहाँ बसे लोगों को प्राथमिकता न मिले उनकी खुली बोली लगनी चाहिए। हो सके तो अवैध रूप से बैठे लोगों को इसमें शामिल ही न किया जाए।जिससे अतिक्रमण को भविष्य में स्थाई होने की सोच ही न पनपे यह होने से इसकी खरीद फरोख्त भी बहुत कम हो जाएगी।
लिखना बोलना बहुत आसान है! सवाल उठता है लाखों करोड़ों लोग अतिक्रमण कर स्वरोजगार से रोजी रोटी कमाते हैं,यदि यह सब पूर्णतः बन्द हो जाएगा तो देश या सरकार रोजगार कहाँ से पैदा करेगी?
क्रमशः ••••

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